परिकल्पना एवं उद्देश्य

परिकल्पना :-
स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने सर्वप्रथम स्वाधीन भारत के लिये यह परिकल्पना दी थी कि- 'एक राष्ट्र, एक राष्ट्रभाषा हो! इसी परिकल्पना को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम सन 1936 में महात्मा गाँधी ने ही वर्धा ग्राम में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की थी। संस्था के उद्देश्यों में राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना था। कार्यवाही पंजी में हस्ताक्षर करने वाले व्यकितयों में निम्नलिखित सदस्य थे:-

  1. महात्मा गाँधी
  2. डा. राजेन्द्रप्रसाद
  3. राजर्षि पुरूषोत्तमदाय टंडन
  4. श्री सेठ जमनालाल बजाज
  5. श्री काका कालेलकर
  6. श्री ब्रजलाल बियाणी
  7. श्री हरिहर शर्मा
  8. श्री वियोगी हरि
  9. श्री शंकरराव देव
  10. श्री बाबा राघवदास

                                 


दक्षिण के चार प्रान्तों (केरल, तमिलनाडू, आंध्र और कर्नाटक) छोड़कर समिति का कार्यक्षेत्र पूरे भारत में स्वीकृत किया गया। उसी संदर्भ में वर्ष 1954 में पहले मध्य-भारत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गठित की गई और सीतामऊ के महाराजकुमार रघुवीरसिंह इसके अध्यक्ष बने। मध्यप्रदेश का गठन होने के बाद समिति को म. प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में परिवर्तित कर प्रांतीय कार्यालय इन्दौर से भोपाल स्थानान्तरित किया गया। समिति के कार्य को स्थायित्व देने के लिये मध्यप्रदेश शासन ने भूखण्ड दिया और शासन के तथा जनता के सहयोग से हिन्दी भवन का निर्माण हुआ। समिति के संस्थापक मंत्री संचालक स्वर्गीय श्री बैजनाथप्रसाद दुबे थे। 28 नवंबर 1988 को उनके निधन के बाद यह दायित्व श्री कैलाशचन्द्र पन्त को सौंपा गया। इस अवधि में समिति के अध्यक्ष पद को निम्नलिखित महानुभावों ने सुशोभित किया :-

1 महाराज कुमार रघुवीरसिंह 1954-1966
2 श्री सौभाग्यमल जैन 1966-1982
3 श्री तनवन्तसिंह कीर 1982-1991
4 श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा 1991-1993
5 श्री तनवन्तसिंह कीर 1993-2001
6 श्री वीरेन्द्र तिवारी 2001-2006
7 श्री रमेश दवे 2006-2013


सन 1957 से 1966 तक निम्न महानुभावों ने कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में समिति को नेतृत्व प्रदान किया :-

  1.  महारानी पद्मावती देवी
  2.  श्री नारायणप्रसाद शुक्ला
  3.  श्री चन्द्रप्रभाष शेखर
  4.  श्री सूरजमल गर्ग

 संस्था के उद्देश्य-

  •  हिन्दी को राष्ट्रभाषा और विश्वभाषा बनवाने में सहयोग करना।
  •  हिन्दी हित संवर्धन ही संस्था का मुख्य  उद्देश्य है।
  •  हिन्दी परीक्षाओं का संचालन कर हिन्दी का प्रसार और भाषा ज्ञान में प्रावीण्य प्रदान करना।
  •  हिन्दी भाषा में साहित्येतर ज्ञान-विषयों पर पुस्तकों का लेखन एवं प्रकाशन।
  •  राष्ट्रभाषा प्रेम के साथ राष्ट्रीयता की भावनाओं में वृद्धि करना।
  •  लोकभाषाओं का संवर्धन और प्रकाशन।
  •  भारतीय भाषाओं के मध्य अन्तर्संवाद स्थापित कर भाषायी सदभाव बढ़ाना।
  •  समाज के साहित्यिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक विकास की दिशा में आयोजन करना।